संतोष कुमार
बिहार सरकार द्वारा पत्रकारों के लिए चलाई जा रही पेंशन योजना को लेकर हाल ही में एक बड़ी घोषणा की गई।अब तक दी जा रही 6000 रुपये की मासिक पेंशन को बढ़ाकर 15000 रुपये कर दिया गया है। इसके अलावा, यदि किसी पत्रकार का निधन हो जाए तो उसके आश्रित को 10000 रुपये प्रति माह दिए जाने की भी बात कही गई है।इंडियन जर्नालिस्ट एशोसिएशन (बिहार ) के प्रदेश उपाध्यक्ष मिथलेश कुमार कहते हैं कि सुनने में यह निर्णय लोकतंत्र के चौथे स्तंभ — पत्रकारों — के सम्मान की दिशा में एक सकारात्मक कदम लगता है।लेकिन जब इस योजना की जमीनी हकीकत देखी जाती है,तो सारा दृश्य एक सरकारी पोस्टर जैसा दिखाई देता है — रंग-बिरंगा, लेकिन पीछे से सादा और बेरंग।

बिहार के 38 जिलों में पाँच साल से अधिक समय से यह योजना चल रही है। मगर आश्चर्य की बात यह है कि अब तक महज 10 या 12 पत्रकारों को ही इसका लाभ मिल सका है। इतने बड़े प्रदेश में इतनी छोटी संख्या का लाभार्थी आंकड़ा ही इस योजना की विफलता को उजागर कर देता है। असल में समस्या योजना की मंशा में नहीं, बल्कि उसकी पात्रता शर्तों में है। सरकार कहती है कि पत्रकार को पेंशन पाने के लिए “पे-स्लिप” जैसे दस्तावेज़ देने होंगे। लेकिन विडंबना देखिए कि आज बिहार समेत पूरे देश में अधिकांश पत्रकार मानदेय पर, संविदा पर या पूर्णतः अवैतनिक रूप से कार्य कर रहे हैं। वेतन का तो प्रश्न ही नहीं, संस्थान उनकी नियुक्ति तक मान्यता नहीं देते। ऐसे में ‘पे-स्लिप’ की अनिवार्यता इस योजना को आम पत्रकारों की पहुँच से दूर कर देती है।
यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि यह योजना एक आकर्षक सरकारी घोषणा बनकर रह गई है — जैसे बिना पटाखे की दिवाली या बिना खबर के अखबार। सरकार चाहती है कि पत्रकार अपने 20-25 साल के अनुभव और संघर्ष को सिर्फ एक कागज़ी पर्ची से सिद्ध करें, जो शायद उन्होंने कभी देखी ही नहीं।
इस योजना को सार्थक बनाने के लिए सरकार को चाहिए कि वह पत्रकारों की वास्तविक स्थिति को समझे और पात्रता की शर्तों को लचीला बनाए। यदि पत्रकार को पे-स्लिप नहीं है, तो जिला सूचना एवं जनसंपर्क कार्यालय, संबंधित मीडिया संस्थान की अनुशंसा, प्रेस कार्ड, अथवा वर्षों की रिपोर्टिंग का रिकार्ड आदि को प्रमाण मानकर भी उसे योजना का लाभ दिया जाना चाहिए।
सरकार को एक पारदर्शी और डिजिटल आवेदन प्रक्रिया बनानी चाहिए जहाँ पत्रकार खुद को ऑनलाइन पंजीकृत कर सकें, और स्थानीय स्तर पर उसकी सच्चाई की पुष्टि की जा सके। साथ ही, पत्रकार संगठनों और मीडिया संस्थानों को भी इस प्रक्रिया में भागीदार बनाया जाना चाहिए।
पत्रकारों को पेंशन देना केवल आर्थिक सहायता नहीं, बल्कि उनके कार्य की मान्यता और सम्मान है। जो पत्रकार हर रोज़ समाज की सच्चाई सरकार तक पहुँचाता है, उसे अपने लिए “सत्यापन” के नाम पर अपमानित न किया जाए। घोषणाएँ तब तक सार्थक नहीं होतीं जब तक उनका लाभ ज़मीन पर दिखाई न दे।
मुख्यमंत्री जी इस योजना की समीक्षा करें,ज़मीनी हकीकत से जुड़ी पात्रता तय करें और इस पहल को एक जनहित योजना बनाएं- न कि केवल कागज़ी उपलब्धि।










