टीसी और मार्कशीट के नाम पर छात्रों से अवैध वसूली का आरोप,’वेतन नहीं मिला तो छात्रों से वसूली’किसान उच्च विद्यालय अंधरवारी पर गंभीर आरोप
मनीष कुमार,रजौली(नवादा)
बिहार की शिक्षा प्रणाली को भ्रष्टाचार मुक्त और पारदर्शी बनाने की सरकारी कोशिशों को रजौली प्रखंड के अंधरवारी गांव स्थित किसान उच्च विद्यालय में गहरा धक्का लगा है।एक तरफ जहां सरकार ‘पढ़ेगा इंडिया तो बढ़ेगा इंडिया’ जैसे नारों से छात्रों को प्रोत्साहित कर रही है, वहीं दूसरी ओर इसी विद्यालय में मैट्रिक पास कर चुके छात्र-छात्राओं को अपने ही अंक पत्र (मार्कशीट) और स्थानांतरण प्रमाण पत्र के लिए भारी कीमत चुकानी पड़ रही है।विद्यालय प्रशासन पर लगे अवैध वसूली के इन आरोपों ने न केवल स्थानीय प्रशासन की नींद उड़ा दी है, बल्कि गरीब अभिभावकों के माथे पर चिंता की लकीरें खींच दी हैं।
छात्रों की बेबसी और विद्यालय में भ्रष्टाचार का खुला तांडव :-
सोमवार का दिन किसान उच्च विद्यालय के छात्रों के लिए किसी मानसिक प्रताड़ना से कम नहीं था। इंटर में नामांकन की समय सीमा नजदीक देख जब छात्र अपने मूल दस्तावेज लेने विद्यालय पहुंचे, तो उनसे कथित तौर पर नाजायज रकम की मांग की गई। छात्रों ने आरोप लगाया कि विद्यालय के जिम्मेदार पदों पर बैठे लोग टीसी और मार्कशीट देने के एवज में 200 रुपये से लेकर 500 रुपये तक की मांग कर रहे हैं। जिन छात्रों ने पैसे देने से इनकार किया या असमर्थता जताई, उनके साथ न केवल टालमटोल किया गया, बल्कि उन्हें घंटों कड़ी धूप में इंतजार कराकर मानसिक रूप से परेशान भी किया गया। अभिभावकों का कहना है कि यह वसूली सीधे तौर पर उनके बच्चों के भविष्य को बंधक बनाने जैसा है।
वेतन की कमी का बहाना और शिक्षकों का गैर-जिम्मेदाराना तर्क :-
इस पूरे मामले में सबसे विवादित मोड़ तब आया जब विद्यालय के प्रभारी पंकज पासवान और सहायक शिक्षक अनवर व विनोद प्रसाद ने अपनी सफाई पेश की। उन्होंने वसूली की बात को सिरे से खारिज करने के बजाय एक अजीबोगरीब तर्क देते हुए कहा कि विद्यालय ‘वेतन रहित’ श्रेणी में आता है और उन्हें लंबे समय से सरकार द्वारा कोई मानदेय नहीं मिला है। शिक्षकों का कहना है कि वे बिना सैलरी के काम कर रहे हैं और विद्यालय संचालन में उन्हें भारी आर्थिक संकट का सामना करना पड़ रहा है। शिक्षकों के इस बयान ने यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या सरकारी तंत्र की विफलता का बोझ उन गरीब छात्रों पर डाला जाएगा, जिनका इस व्यवस्था से कोई लेना-देना नहीं है।
शिक्षा व्यवस्था की साख पर लगा बड़ा प्रश्नचिह्न :-
अंधरवारी के इस प्रकरण ने यह साबित कर दिया है कि जमीनी स्तर पर शिक्षा विभाग के नियमों की जमकर धज्जियां उड़ाई जा रही हैं। यदि एक सरकारी मान्यता प्राप्त विद्यालय में छात्रों को अपने ही अधिकार प्राप्त करने के लिए रिश्वत देनी पड़ रही है, तो यह पूरी व्यवस्था की विफलता को दर्शाता है। अब क्षेत्र के लोगों की निगाहें प्रशासन की आगामी कार्रवाई पर टिकी हैं। क्या प्रशासन इन अवैध गतिविधियों पर लगाम लगा पाएगा या फिर ‘वेतन नहीं मिलने’ का बहाना बनाकर शिक्षा के नाम पर वसूली का यह काला खेल बदस्तूर जारी रहेगा, यह आने वाला समय ही बताएगा। फिलहाल, छात्रों में डर और अनिश्चितता का माहौल है कि क्या वे बिना पैसे दिए अपना नामांकन अगले सत्र में करा पाएंगे।
प्रशासनिक दखल और दोषियों पर कार्रवाई की बढ़ती मांग :-
विद्यालय के शिक्षकों द्वारा दी गई इस दलील ने स्थानीय ग्रामीणों में भारी आक्रोश भर दिया है। ग्रामीणों का स्पष्ट कहना है कि शिक्षकों का वेतन न मिलना विभाग और सरकार के बीच का प्रशासनिक मुद्दा है, इसके लिए छात्रों से उनके कानूनी दस्तावेजों के बदले पैसे वसूलना पूरी तरह गैर-कानूनी है। यह मामला जब रजौली अनुमंडल पदाधिकारी (एसडीएम) स्वतंत्र कुमार सुमन के संज्ञान में आया, तो उन्होंने इसे गंभीरता से लेते हुए जांच के आदेश दे दिए हैं। एसडीएम ने कड़ा रुख अपनाते हुए कहा है कि किसी भी परिस्थिति में छात्रों का शोषण बर्दाश्त नहीं किया जाएगा और जांच रिपोर्ट के आधार पर दोषी पाए जाने वाले कर्मियों पर कठोर दंडात्मक कार्रवाई सुनिश्चित की जाएगी। वहीं प्रभारी प्रखंड शिक्षा पदाधिकारी राकेश कुमार ने बताया कि वे मंगलवार को विद्यालय में जाकर जांच किया जाएगा,उसके बाद अग्रतर कार्रवाई सुनिश्चित की जाएगी।









